16.8 C
New Delhi
Tuesday, March 5, 2024

Advertisementspot_imgspot_imgspot_imgspot_img
HomeMaldives New President: मालदीव में चल गया चीनी पैंतरा, नए राष्ट्रपति बोले-...

Maldives New President: मालदीव में चल गया चीनी पैंतरा, नए राष्ट्रपति बोले- भारतीय सेना हटाकर रहेंगे, क्या है पीछे की पूरी कहानी।

Chinese maneuver started in Maldives, new President said – Indian army will be removed.

भारत की जमीन से महज 1200 किमी दूर बसा 5 लाख आबादी वाला छोटा सा देश, जो अपने खूबसूरत आइलैंड्स के लिए जाना जाता है। बॉलीवुड सेलिब्रिटीज काम से छुट्टी मिलते ही अकसर वहीं घूमते पाए जाते हैं। हम बात कर रहे हैं मालदीव की। इन दिनों ये देश राजनीतिक वजहों से चर्चा में है।

मालदीव के राष्ट्रपति चुनाव में मोहम्मद मोइज्जू की जीत हुई है। मोहम्मद मुइज्जू चीन समर्थक माने जाते हैं और उन्होंने अपने पहले ही बयान में ये साबित कर दिया। मुइज्जू ने कहा कि वो अपने चुनावी वादे पर डटे हुए हैं और भारतीय सेना को मालदीव के आर्किपेलागो (द्वीपसमूहों) से हटाएंगे।

भारत और मालदीव की दोस्ती काफी पुरानी है। 1988 में राजीव गांधी ने सेना भेजकर मौमून अब्दुल गयूम की सरकार को बचाया था। 2004 में जब सुनामी आई तो भारत का ही पहला प्लेन मदद लेकर पहुंचा था। कोरोना महामारी के समय भारत ने मालदीव को कोविशील्ड वैक्सीन गिफ्ट के तौर पर दी थी।

मालदीव में 2 साल पहले शुरू हुआ ‘इंडिया आउट’ कैम्पेन

2018 की बात है। चीन के करीबी और PPM के नेता राष्ट्रपति अब्दुल्लाह यामीन राष्ट्रपति चुनाव हार जाते हैं। बाद में उन्हें हवालेबाजी और एक अरब डॉलर के सरकारी धन का दुरुपयोग करने का दोषी पाया गया। 2019 में यामीन को पांच साल की सजा हुई। नए राष्ट्रपति बने इब्राहिम मोहम्मद सोलिह, जो ‘इंडिया फर्स्ट’ की पॉलिसी पर चलते थे।

कोरोना के चलते यामीन की जेल की सजा को नजरबंदी में बदल दिया गया। नवंबर 2021 में यामीन के खिलाफ लगे सारे आरोप खारिज कर दिए गए और 30 नवंबर को रिहा कर दिया गया। इसके बाद उनका दोबारा राजनीति में आने का रास्ता भी साफ हो गया। इसके बाद वह चुनाव प्रचार में जुट गए और अक्सर अपने भाषणों में लोगों से अपील करने लगे कि अपने घरों की दीवारों पर ‘इंडिया आउट’ लिखें।

2023 के राष्ट्रपति चुनाव में मोहम्मद सोलिह के खिलाफ मोहम्मद मुइज्जू ने दावेदारी पेश की। उन्होंने मालदीव में कथित भारतीय सेना की उपस्थिति के खिलाफ ‘इंडिया आउट’ का नारा दिया था और इसे लेकर कई विरोध प्रदर्शन भी आयोजित किए। यह अभियान इस बात पर आधारित था कि भारतीय सैनिकों की मौजूदगी मालदीव की संप्रभुता के लिए खतरा है।

पिछले शनिवार को मालदीव के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आए। चुनाव में प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव यानी PPM के नेता मोहम्मद मुइज्जू की जीत हुई। PPM गठबंधन को चीन के साथ करीबी रिश्तों के लिए जाना जाता है। मुइज्जू की जीत के साथ ही ये अटकलें तेज हो गईं कि अब तक मौजूदा राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की ‘इंडिया फर्स्ट’ पॉलिसी वाले मालदीव का रुख बदल जाएगा और ये भारत के लिए परेशानी बन सकता है।

चीन समर्थक मुइज्जु को चुनाव जीतने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को बधाई भी दी। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, ‘मालदीव के राष्ट्रपति चुने जाने पर डॉ. मोहम्मद मुइज्जू को बधाई। भारत मालदीव के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।’

इसके एक दिन बाद ही सोमवार को मालदीव के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपने समर्थकों को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि वह अपने चुनावी वादे पर डटे हुए हैं और भारतीय सेना को मालदीव के आर्किपेलागो यानी द्वीपसूमह से हटाएंगे। मुइज्जू ने ये भी कहा कि विदेशी सेना की वापसी तय नियमों के तहत होगी और जिनका सहयोग जरूरी होगा, उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।

मालदीव में भारतीय सेना कर क्या रही है?

भारत ने मेडिकल इवैकुएशन और हिंद महासागर में समुद्री निगरानी में मदद के लिए मालदीव को दो हेलिकॉप्टर और एक डोर्नियर विमान दान में दिया था। इस समय मालदीव में तैनात 75 भारतीय सैनिकों में से अधिकांश विमान के रख-रखाव और ऑपरेट करते हैं।

भारतीय सेना लंबे समय से मालदीव में है। इसमें कुछ भी नया नहीं है। ऑस्ट्रेलिया में नेशनल सिक्योरिटी कॉलेज में सीनियर रिसर्च फेलो डॉ. डेविड ब्रूस्टर कहते हैं कि भारतीय सैनिक मालदीव नेशनल डिफेंस फोर्स के तहत काम करते हैं। उनका मुख्य काम एक विमान और दो हेलिकॉप्टरों को छोटे द्वीपों से मरीजों को इलाज के लिए अस्पतालों तक पहुंचाने में इस्तेमाल करने के लिए सहयोग देना है। मैं इस बात से हैरान हूं कि मुइज्जू और उनके समर्थक सोचते हैं कि यह बुरी बात है।

क्या चीन के बढ़ते दखल की वजह से मालदीव ऐसा कर रहा?

साल 2008 से पहले मालदीव में मौमून अब्दुल गयूम का शासन था। इस दौरान मालदीव संतुलनवादी नीति अपनाता था। यानी किसी भी देश का खुलकर समर्थन नहीं करता था, लेकिन 2008 में मोहम्मद नशीद मालदीव के राष्ट्रपति बने। इसके बाद से मालदीव ने भारत की ओर अपने झुकाव को सार्वजनिक किया। इस दौरान नशीद ने खुलकर चीन की आलोचना की।

वहीं 2013 में अब्दुल्ला यामीन सत्ता में आए। उन्होंने भी मुखर विदेश नीति की परंपरा अपनाई। हालांकि, उनका झुकाव चीन की ओर था। इस दौरान यामीन ने माले को हुलहुमाले द्वीप से जोड़ने वाले 2.1 किमी लंबे चार लेन वाले ब्रिज का उद्घाटन किया था।

यह एकमात्र ब्रिज है जो द्वीपसमूह में द्वीपों को जोड़ता है जहां लोग अलग-अलग एटोल के बीच नावों पर यात्रा करते हैं। बीजिंग ने इस प्रोजेक्ट के लिए 200 मिलियन डॉलर दिए। सालों तक चीन को इस छोटे देश में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यहां तक कि 2012 तक मालदीव में चीन का एक भी दूतावास नहीं था।

हालांकि, यामीन की सरकार के एक फैसले से सब कुछ बदल गया। यह फैसला फ्री ट्रेड एग्रीमेंट यानी FTA पर समझौते का था। इससे मालदीव से होने वाले मछली के निर्यात पर से शुल्क लगना बंद हो गया और द्वीपसमूह को चीनी वस्तुओं और सेवाओं के लिए खोल दिया गया।

चीन ने मालदीव में अन्य प्रोजेक्ट के अलावा ब्रिज और एक एयरपोर्ट बनाने के लिए एक अरब डॉलर से अधिक का कर्ज दिया। साल 2018 में फिर मालदीव की विदेश नीति भारत की ओर मुड़ गई। राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के सत्ता में आते ही भारत और मालदीव फिर पास आ गए।

सोलिह की सरकार ने यामीन पर देश को चीनी कर्ज के जाल में फंसाने का आरोप लगाया। 6.1 अरब GDP वाले मालदीव पर GDP का 113% कर्ज है। मालदीव सभी क्षेत्रों में भारत पर बहुत अधिक निर्भर है, चाहे वह बुनियादी ढांचे के विकास की बात हो या स्वास्थ्य और शिक्षा की, मालदीव भारत की मदद इन क्षेत्रों में लेता है।

वहीं एक्सपर्ट कहते हैं कि भारत का करीबी होने के साथ ही इब्राहिम मोहम्मद सोलिह सरकार किसी देश की विरोधी नहीं रही है। इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने कॉमनवेल्थ के साथ मालदीव के रिश्तों की फिर शुरुआत की। चीन के साथ बेहतर संबंध रखे और कई देशों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए।

मालदीव में चीन समर्थक सरकार का बनना भारत के लिए चिंता की बात क्यों है?

चीन के लिए मालदीव सामरिक रूप से काफी अहम है। मालदीव रणनीतिक रूप से जिस समुद्र में बसा है वो काफी अहम है। चीन की मालदीव में मौजूदगी हिंद महासागर में उसकी रणनीति का हिस्सा है। 2016 में मालदीव ने चीनी कंपनी को एक द्वीप 50 सालों की लीज पर महज 40 लाख डॉलर में दे दिया था।

भारत के लिए भी मालदीव कम महत्वपूर्ण नहीं है। मालदीव भारत के बिल्कुल पास में है और वहां चीन पैर जमाता है तो भारत के लिए चिंतित होना लाजमी है। भारत के लक्षद्वीप से मालदीव करीब 700 किलोमीटर दूर है और भारत के मुख्य भूभाग से 1200 किलोमीटर।

विपरीत हालात में मालदीव से चीन का भारत पर नजर रखना आसान होगा। मालदीव ने चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किया है। यह भी भारत के लिए हैरान करने वाला कदम था। इससे साफ है कि मालदीव भारत से कितना दूर हुआ है और चीन के कितना करीब आ गया है।

अब आखिर में भारत-मालदीव की दोस्ती से जुड़ा 35 साल पुराना एक किस्सा…

3 नवंबर 1988 की बात है। मालदीव के राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम भारत यात्रा पर आ रहे थे, लेकिन ऐन वक्त पर यह दौरा रद्द हो गया। गयूम के खिलाफ विद्रोह की योजना बन रही थी। इसका प्लान मालदीव के व्यापारी अब्दुल्ला लुथूफी और उसके साथी सिक्का अहमद इस्माइल मानिक ने बनाया था।

लुथूफी ने बगावत को अंजाम देने के लिए श्रीलंका के तमिल विद्रोही संगठन पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम के उग्रवादियों का सहारा लिया। इसी दिन हथियारबंद उग्रवादियों ने राजधानी माले की सरकारी इमारतों को अपने कब्जे में ले लिया।

इसकी भनक पाते ही राष्ट्रपति गयूम सेफ हाउस में चले गए। उन्होंने भारतीय PM राजीव गांधी से सेना भेजने की अपील की। इसके बाद राजीव गांधी ने मदद का आदेश दिया।

सबसे पहले सेना ने माले के एयरपोर्ट को अपने नियंत्रण में लिया और राष्ट्रपति गयूम को सिक्योर किया। इसके बाद सेना माले से उग्रवादियों को खदेड़ने लगी। दो दिन के अंदर यह ऑपरेशन खत्म हुआ। इसे नाम दिया गया ऑपरेशन कैक्टस। इस ऑपरेशन के जरिए गयूम का तख्तापलट करने की कोशिश नाकाम कर दी गई।