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Friday, March 1, 2024

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Nusrat Bharucha: लड़की होने के नाते नुसरत भरूचा को कई बार हुआ हीनता का अहसास।

Nusrat Bharucha: Being a girl, Nusrat Bharucha felt inferior many times.

Nusrat Bharucha: प्यार का पंचनामा’, ‘सोनू के टीटू की स्वीटी’, ‘छोरी’, ‘जनहित में जारी’ जैसी कई फिल्में कर चुकी नुसरत भरूचा इन दिनों चर्चा में हैं अपनी नई फिल्म ‘अकेली’ को लेकर। आतंकी हमले के बीच फंसी अकेली लड़की का किरदार निभाने वाली नुसरत ने ‘नवभारत टाइम्स’ संग इस मुलाकात में कई मुद्दों पर बात की। नुसरत ने बताया कि भले ही वह महिला प्रधान फिल्में कर रही हैं, लेकिन कभी-कभी एक लड़की होने के नाते उन्होंने हीनता का भी अहसास किया। बहुत ऐसे मौके आए जब सभी अपनी राय देते हैं और महिलाओं को समझ लिया जाता है कि उनके पास कोई राय नहीं होगी। यह कहकर ज्यादातर महिलाओं को चुप करा दिया जाता है कि हम बात कर रहे हैं। नुसरत ने यह भी बताया कि महिला प्रधान फिल्में करते वक्त उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

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Nusrat Bharucha: लड़की होने के नाते नुसरत भरूचा को कई बार हुआ हीनता का अहसास। 2

आप हमेशा महिला किरदारों के मजबूत रूप में दिखती हैं: नुसरत भरुचा

Nusrat Bharucha: नुसरत भरुचा ने बताया कि कई मौके आए ऐसे, जब मैंने खुद को एम्पावर्ड पाया। जब मैं बच्ची थी और स्कूल में थी, तब मुझे खूब बुली किया जाता था। तब मैं दुबली-पतली और डरपोक-सी लड़की हुआ करती थी। मेरी आवाज भी नहीं निकलती थी। मैं रोज निशाना बनती थी। तब मेरा एक दोस्त हुआ करता था, जिसने मेरी हालत देखी, वो मुझसे उम्र में बड़ा था, मेरे भाई जैसा। उसने मुझसे दोस्ती की और मुझे विश्वास दिलाया कि मुझे इन लोगों की जरूरत ही नहीं है। जब वो तेरा मजाक उड़ाते हैं, तो तू उनके पास क्यों जाती है? उसने मुझे अपना दोस्त बना लिया। उसने जब कहा न, कि तुझे किसी की जरूरत नहीं, तो मैं आपको बता नहीं सकती कि मुझे क्या कॉन्फिडेंस मिला? उसके बाद मैं न कभी किसी की मोहताज रही और न ही कभी मैंने किसी की बकवास बर्दाश्त की। बाद में जब मैं थोड़ी बड़ी हुई, तब भी किसी पर आश्रित नहीं रही। कोई कहता रात को आपको घर छोड़ दें, तो कहती नहीं मैं चली जाउंगी।

कभी हीनता का होता था एहसास

Nusrat Bharucha: नुसरत भरुचा ने कहा कि जब हमारे बारे में धारणाएं बनाई जाती हैं। जैसे दो -तीन चीजों से जोड़कर हमारी वैल्यू कम कर दी जाती है। जैसे अगर ये ग्लैमरस है, तो इसमें गहराई नहीं होगी। कई बार जब हम ग्रुप में बैठे होते हैं और सभी लोग अपनी-अपनी राय दे रहे होते हैं, तो लोग कहते हैं, इसके (महिला) पास क्या ओपिनियन होगा? हमारे पॉइंट ऑफ व्यू को महत्व नहीं दिया जाता। तुम्हें क्या पता? हम बात कर रहे हैं न? यही कह कर हमें चुप करवाया जाता है। और ये ज्यादातर सभी महिलाओं के साथ होता है। ऐसे समय में काफी हीनता महसूस होती है।

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