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छत्तीसगढ़ की‌ राजनांदगांव लोकसभा सीट‌ को लेकर खूब चर्चा, भूपेश बघेल के लिए कितनी मुश्किल या आसान है राजनांदगांव की सीट

रायपुर
छत्तीसगढ़ की‌ राजनांदगांव लोकसभा सीट‌ को लेकर इन दिनों खूब चर्चा हो रही है‌। चर्चा इसलिए क्योकि इस लोकसभा सीट से छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चुनावी मैदान में उतर गए हैं। भाजपा की मजबूत राजनांदगांव लोकसभा सीट में कांग्रेस के भूपेश बघेल चुनाव में सेंधमारी करने की तैयारी में जुट गए हैं। बघेल के चुनाव लड़ने को लेकर राजनीति के जानकारों का मानना है कि बघेल की राजनंदगांव सीट से राह आसान नहीं है। यहां पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का अभी भी दबदबा बरकरार है। इस सीट‌ से भाजपा साल 1999 से साल 2019 तक छह बार हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पांच बार जीत हासिल की है तो वहीं कांग्रेस ने सिर्फ एक बार ही खाता खोल पाई है। इस बार सबकी निगाहें राजनांदगांव और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले बघेल पर टिकी हैं।

भूपेश बघेल की लोकप्रियता भाजपा प्रत्याशी से ज्यादा, फीका पड़ सकता है मोदी का जादू
राजनांदगांव को बड़ी करीब से जानने वाले क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकार कमलेश सीमनकर ने लाइव हिंदुस्तान से बातचीत में बताया कि राजनांदगांव लोकसभा सीट से भूपेश बघेल के चुनाव लड़ने की खबर के बाद राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। यहां भाजपा ने मौजूदा सांसद संतोष पांडे को एक बार फिर चुनाव के मैदान में उतारा है। क्षेत्र में संतोष पांडे की सक्रियता को लेकर लगातार जनता सवाल उठा कर रही है। वहीं दूसरी तरफ अगर भूपेश बघेल और संतोष पांडे की लोकप्रियता की बात करें तो भूपेश बघेल, भाजपा के संतोष पांडे की अपेक्षा ज्यादा लोकप्रिय नेता हैं। बघेल के कार्यकाल में राजनांदगांव लोकसभा सीट के भीतर दो नए जिले बनाए गए है। जिसका उन्हें लोकसभा के चुनाव में जरूर फायदा देखने को मिल सकता है। भूपेश बघेल संतोष पांडे की अपेक्षा राजनांदगांव सीट से मजबूत प्रत्याशी माने जा रहे हैं। इसके अलावा राजनांदगांव लोकसभा क्षेत्र के अंदर आने वाली आठ विधानसभा में पांच विधानसभा पर कांग्रेस पार्टी का कब्जा है। कहीं ना कहीं इसका फायदा लोकसभा के चुनाव में भूपेश बघेल को मिल सकता है। भूपेश बघेल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भी रहे हैं, मुख्यमंत्री रहने के दौरान वह लगातार राजनांदगांव क्षेत्र में बेहद सक्रिय दिखाई दिए हैं। बघेल की सक्रियता और यहां की विधानसभा में बैठे उनके विधायक का फायदा भूपेश बघेल को राजनांदगांव लोकसभा के चुनाव में मिल सकता है।

राजनांदगांव लोकसभा में अब तक किसका रहा दबदबा
छत्तीसगढ़ की राजनांदगांव लोकसभा सीट की‌ बात करें तो साल 1962 से लेकर 2019 तक हुए चुनाव में राजनांदगांव से‌ कई बार बाहरी प्रत्याशियों ने भी चुनाव लड़ा है। साल 1962 में खैरागढ़ के रहने वाले वीरेंद्र बहादुर यहां से चुनाव जीते थे। साल 1967 में खैरागढ़ की पद्मावती देवी चुनाव जीत कर सांसद बनी थी। साल 1971 में रामसहाय पांडे जो कि मुंबई के रहने वाले थे, उन्हें कांग्रेस ने यहां से टिकट दिया और वह सांसद बने थे। साल 1977 में मदन तिवारी सांसद बने थे। 1980 में खैरागढ़ के शिवेंद्र बहादुर सांसद बने थे। 1984 में दुर्ग के धरमपाल गुप्ता सांसद बने। 1992 में खैरागढ़‌ के शिवेंद्र बहादुर, 1996 में राजनांदगांव के अशोक शर्मा, 1998 में कांग्रेस पार्टी के मोतीलाल वोरा, 1999 में भाजपा के डॉ रमन सिंह, 2004 में भाजपा के प्रदीप गांधी, 2009 में भारतीय जनता पार्टी से मधुसूदन यादव, 2007 में कांग्रेस पार्टी के देवव्रत सिंह, साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी से अभिषेक सिंह, साल 2019 में भारतीय जनता पार्टी के संतोष पांडे सांसद रहे हैं।

राजनांदगांव लोकसभा सीट में खैरागढ़ राजघराने का रहा कब्जा
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र में अब तक हुए चुनाव में सबसे ज्यादा छह बार खैरागढ़ क्षेत्र से सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचे हैं। हमेशा से ही राजनांदगांव लोकसभा सीट में खैरागढ़ राज परिवार का कब्जा रहा है। राज परिवार से ताल्लुक रखने वाले वीरेंद्र बहादुर सिंह ने अपना पहला चुनाव साल 1962 में जीता था। उनके बाद उनकी पत्नी पद्मावती देवी 1967 में सांसद चुनकर लोकसभा पहुंची थी। वही 1980, 1984 और 1992 में खैरागढ़ राज परिवार के शिवेंद्र बहादुर सांसद रहे हैं। इसके बाद साल 2007 में हुए उपचुनाव में खैरागढ़ राज्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले देवव्रत सिंह सांसद चुनकर लोकसभा पहुंचे थे।